Friday, September 18, 2015

Bengal government to help 30 lakh flood-hit farmers


Kolkata, Sep 18 (PTI) The West Bengal government has decided to give monetary compensation to 30 lakh farmers who have lost their crops due to floods in the state.
"Nearly 30 lakh farmers who have suffered partial or full crop damage will get a compensation of Rs 13,500 from the state government," Pradip Majumdar, Chief Agriculture Advisor to Chief Minister Mamata Banerjee said.
More than 11.5 lakh hectares of land has been identified by the state government which has been either fully or partially affected by the floods in the month of August this year.
"Near about 13 lakh hectares of land has been affected either partially or fully. Out of this we have identified 11.5 lakh hectares of land farmers of which are eligible for compensation," said Mazumdar.
He said that more than 10 lakh farmers had been registered so far who would be eligible for the compensation.
"With the next few days we will be able to complete the list of 30 lakh farmers for their registration," said Mazumdar.
The compensation of Rs 13,500 would be given to farmers to create new seed bed for cultivation of crops as existing sea beds have been washed away by the floods.
PTI 

पैदावार बढ़ाने के लिए तकनीक पर जोर

सूखे की आशंका से जूझ रही बिहार सरकार इस साल धान की पैदावार में इजाफा करने के लिए तकनीक का सहारा लेने का फैसला लिया है। राज्य सरकार इस साल 3-4 लाख हेक्टेयर में संकर (हाईब्रिड) बीजों से खेती कराएगी। साथ ही, उसने पैदावार में इजाफे के लिए उन्नत कृषि तकनीकों का भी सहारा लेने का फैसला किया है। इस बीच राज्य मंत्रिमंडल ने डीजल अनुदान के रूप में 785 करोड़ रुपये जारी करने की अनुमति दे दी है।

राज्य सरकार को इस साल सामान्य से कम बारिश होने का अनुमान है। राज्य सरकार के अधिकारियों ने बताया, ' इस साल मानसून राज्य में देरी में आया है। हम इस साल सामान्य बारिश की उम्मीद कर रहे हैं, लेकिन मौसम विभाग के आंकड़ों की मानें तो इस साल राज्य में सामान्य से 5-10 फीसदी तक बारिश हो सकती है। साथ ही, बारिश के औसत दिनों की तादाद भी कम हो सकती है। इस वक्त इस मौसम में औसतन 20-30 दिनों तक बारिश होने की उम्मीद है, जबकि सामान्य मौसम में राज्य में 35-45 दिनों तक बारिश होती है।' कमजोर मानसून का सीधा असर राज्य में धान की पैदावार पर होगा, इसीलिए राज्य सरकार ने इस बार अपनी तैयारी चुस्त करने का फैसला लिया है। पैदावार में इजाफा करने के लिए कृषि विभाग ने इस बार उन्नत बीजों के साथ-साथ नई कृषि तकनीकों का भी इस्तेमाल करने का फैसला लिया है।

राज्य सरकार ने इस साल 3-4 लाख हेक्टेयर में उन्नत बीजों के जरिये खेती कराने का फैसला लिया है। राज्य सरकार ने इसके लिए किसानों को सस्ती दरों में संकर बीज मुहैया कराएगी। राज्य सरकार के सूत्रों ने बताया, 'हम हर खरीफ के मौसम में किसानों को सस्ती दरों पर बीज मुहैया कराते हैं, ताकि राज्य में पैदावार में इजाफा हो सके।'
SOURCE - business-standard

अगर अपनाएं उचित समाधान तो बचे रहेंगे खेत-खलिहान

यह हमारा मायूसीभरा दौर है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस साल ईश्वर भारतीय किसानों पर सबसे ज्यादा कुपित रहे हैं। साल की शुरुआत में अजीबोगरीब मौसमी हालात बने, ओलावृष्टिï और बेमौसम बारिश ने खेतों में तैयार फसल को बरबाद कर दिया। किसी को अंदाजा नहीं कि क्या हो रहा था। हर साल हमारा सामना 'पश्चिमी विक्षोभ' नाम की मौसमी परिघटना से होता है, जिसमें भूमध्य सागर से चलने वाली हवाएं भारत के पूर्वी हिस्से तक बहती हैं। इस साल नई बात यही थी कि इसकी 'तीव्रता' बहुत ज्यादा थी, जिसके चलते बहुत जोरों से बेमौसम बारिश हुई। इससे भी महत्त्वपूर्ण यह कि अमूमन हिमालय के ऊपर 'टूटने' के बजाय इस विक्षोभ की हवाएं नमी के साथ बंगाल और यहां तक कि दक्षिण में मध्य प्रदेश के ऊपर तक पहुंच गईं। मौसम विज्ञानी इसकी पहेली में उलझकर रह गए। 

दूसरी ओर किसान अपनी आंखों के सामने लहलहाती फसल को बरबाद होते देखने पर मजबूर थे। उनका दर्द साफ तौर पर महसूस किया जा सकता था। हालात का जायजा लेने के लिए ग्रामीण उत्तर प्रदेश गए मेरे सहकर्मी, वहां से तमाम कारुणिक कहानियों के साथ लौटे। किसान खेती की बढ़ती लागत के साथ पहले ही कर्ज के भंवर में फंसे हुए हैं और अब उन पर यह आपदा आ पड़ी। यह किसी वज्रपात से कम नहीं था।  

मगर यह तो महज साल की शुरुआत थी, जब पहली फसल का सत्र चल रहा था। फिर सूखे की आशंका के खतरे की घंटी बजी, जिसका ताल्लुक अल नीनो से है। अल नीनो प्रशांत महासागर के गरम होने से उपजने वाला एक मौसमी परिवर्तन है, जो मॉनसून की हालत पस्त कर देता है। देश के कई इलाकों में यह मॉनसून के दगा देने वाला लगातार दूसरा, तीसरा या यहां तक कि चौथा साल रहा। यह खतरनाक स्थिति है, जहां देश के कई इलाकों में फसलों, मवेशियों और पेयजल के लिए पानी ही उपलब्ध नहीं। अहम सवाल यही है कि क्या यह जल्द खत्म हो जाएगा या फिर यह सिर्फ शुरुआत भर है कि भविष्य की तस्वीर कैसी दिखने वाली है? इस प्रश्न का जवाब एक तरह से जीवन और मौत का सवाल है। 

अगर हम मौसम की मायूसी को नुकसान वाले साल का हाल समझकर नजरअंदाज कर भी दें तो हम कभी उन सुधारों को अमल में नहीं ला पा पाएंगे, जिनकी भविष्य को देखते हुए बहुत शिद्दत से दरकार है क्योंकि भविष्य और ज्यादा जोखिमभरा और हमें अधिक संवेदनशील बनाता नजर आ रहा है। मौसम विज्ञानी आपको बताएंगे कि मौसम ज्यादा तुनकमिजाज होता जा रहा है, ज्यादा उलझाऊ और निश्चित रूप से ज्यादा विध्वंसक। यहां तक कि अगर वे 'जलवायु' शब्द के इस्तेमाल को लेकर हिचकते हैं, मगर इस बात पर सहमत हैं कि कुछ नया सक्रिय हो रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह एक सामान्य मौसमी भिन्नता है लेकिन इसमें दीर्घावधिक परिवर्तन करने का माद्दा है। ऐसे में हम क्या कर रहे हैं? 

पहला तो यही कि हमें मौसम विज्ञानों के लिए अधिक से अधिक संसाधन झोंकने होंगे। इसी में हमारे भविष्य की सुरक्षा निहित है।  हमें मॉनसून और मौसम अनुमान के विज्ञान में निवेश बढ़ाने की जरूरत है। पिछले बजट में सभी वैज्ञानिक मंत्रालयों के लिए आवंटित धन में कटौती की गई थी। इसका अर्थ यही है कि पुणे स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटिरियोलॉजी जैसे मॉनसून के अध्ययन में लगे संस्थानों के सालाना बजट में 25 से 30 फीसदी की सालाना कटौती हो सकती है। हमें इस जीवनरेखा विज्ञान पर कम नहीं बल्कि और अधिक खर्च करने की जरूरत है। 

दूसरी बात कि हमें अपने कृषि संकट के समाधान के लिए अधिक प्रयास करने की आवश्यकता है। यह स्पष्टï है कि किसान दो पाटों के बीच फंसे हुए हैं। एक ओर तो आगम लागतें, विशेषकर श्रम और पानी का खर्च लगातार बढ़ रहा है, दूसरी ओर खाद्य कीमतें नियंत्रण के दायरे में हैं। हमारी खाद्य मूल्य नीति इस धारणा पर आधारित है कि हम एक गरीब देश हैं, इसलिए उपभोक्ताओं के हित अवश्य ही सुरक्षित रखे जाने चाहिए। मगर इसका अर्थ यही है कि किसान, जो खाद्य उपभोक्ता भी हैं, उन्हें उनके उत्पादों की उचित कीमत नहीं मिल पा रही है। 

वहीं विनियंत्रण और कारोबार को सुगम बनाने को लेकर बड़ी बड़ी बातें कभी उनके खेतों पर केंद्रित नहीं हो पातीं। वे अपने उत्पाद कहां बेच सकते हैं, इस पर भी प्रतिबंध हैं, कीमतें भी कृत्रिम रूप से 'नियत' रखी जाती हैं और जब भी किसी वस्तु की किल्लत होती है तो सरकार भारी सब्सिडी से संचालित वैश्विक फर्मों से बड़े पैमाने पर खरीद कर लेती है। यह सिलसिला जारी नहीं रखा जा सकता। 

तीसरी बात यही कि हमें इन तथ्यों को मद्देनजर रखते हुए विकास की की योजना बनानी होगी कि मौसम में और भिन्नता आएगी और उसके प्रभाव और ज्यादा पड़ेंगे। हमें सभी उपलब्ध विकल्प आजमाने होंगे। इसमें कोई अनोखा विज्ञान नहीं है। इसके लिए जल और निकासी अवसंरचना स्थापित करनी होगी, जिसमें दोनों खूबियां होनी चाहिए कि वह वर्षा के अतिरेक जल का भंडारण कर सके और वर्षा न होने की स्थिति में भूमिगत जल के स्तर को बढ़ा सके। पिछले बजट में सरकार ने सिंचाई में निवेश को भी घटा दिया। हम जल सुरक्षा का ढांचा तैयार करने में ग्रामीण रोजगार की पूरी संभावनाओं का दोहन भी नहीं कर पा रहे हैं। हम अभी तक यह समझ नहीं पाए हैं कि जलवायु जोखिम वाले भारत में जल को लेकर हमें जुनूनी होना होगा। शहरों से लेकर सड़कों तक और बंदरगाहों से लेकर बांधों तक अवसंरचना विकास की प्रत्येक कवायद इस तरह से अंजाम दी जाए कि उसमें पर्यावरण मानकों का पूरा खयाल रखा जाए। 

चौथे कदम के तौर पर हमें किसानों के नुकसान का आकलन और उसकी भरपाई का उचित और त्वरित तरीका तलाशना होगा। फिलहाल हमारी तथाकथित किसान बीमा योजना खराब ढंग से बनाई गई और उसका कार्यान्वयन भी ठीक नहीं है। हमें हवा का रुख भांपना होगा, तभी हम इन मरते खेतों को बचा सकते हैं। 

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बेहतर उपज के लिए आधुनिक विधि पर जोर

कम खर्च और कम समय में अधिक उत्पादन लेने के लिए बिस्तर जिले के किसान आधुनिक तकनीकी अपना रहे हैं। अब वे इजरायली मचलिंग विधि के बाद चीन और जापान की ग्रॉफ्टिंग विधि से खेती कर रहे हैं। पहली बार हो रही इस खेती में किसानों को बड़े पैमाने पर फायदे की उम्मीद है। अंचल के प्रगतिशील किसान राजेश नायडू ने बताया कि मल्चिंग विधि से खेती करने में किसानों को कम खर्च में सामान्य से 2 गुना लाभ होता है, जबकि ग्राफ्टिंग में लागत से 5 गुना से अधिक लाभ मिलता हैै। उन्होंने बताया कि इस विधि से वे 3 एकड़ में बैगन की खेती कर रहे हैं। वहीं इस विधि में किसान 10 से 12 महीने तक पैदावार ले सकते हैं।

इसी विधि से 5 एकड़ में टमाटर की खेती कर रहे एक अन्य किसान योगेश टांक ने बताया कि इस विधि से खेती करने में वायरस और अन्य कीट-व्याधियों का प्रकोप नहीं के बराबर होता है, जिसके चलते उत्पादन में काफी वृद्धि होती है। किसान ने बताया कि इससे खेती में हो रहे फायदे को देखते हुए कई किसान इस विधि से खेती की जानकारी लेने उनके पास आ रहे हैं। एक अन्य किसान ने बताया कि बैगन व टमाटर के अलावा किसान लौकी, टिंडा, खरबूज-तरबूज और शिमला मिर्च की खेती ग्राफ्टिंग विधि से कर सकते हैं। इसके लिए दूसरी विधि अपनाई जाती है। जिसकी जानकारी किसान को खेती करने से पहले दे दी जाती है, ताकि किसान समय पर खेतों में उपयुक्त व्यवस्था कर सकें। 

मंडी में अमचूर के नहीं खरीदार

बेमौसम बारिश से इमली के बाद अब अमचूर के कारोबार पर भी असर पड़ता दिख रहा है। कारोबारियों की तमाम कोशिशों के बाद भी अमचूर की आवक गुणवत्ता के हिसाब से नहीं हो पा रही है। दूसरी ओर आवक कम होने से इस साल कारोबार भी कम रहने का अंदेशा है। मंडी में इस समय जो अमचूर आ रहा है, उसकी गुणवत्ता अच्छी नहीं है, जिससे दाम भी कम मिल रहे हैं। वहीं मंडी के व्यापारियों को कोई लिवाल भी नहीं मिल रहा है। व्यापारियों ने बताया कि बारिश के चलते आम की फसल बड़े पैमाने पर प्रभावित हुई है। मंडी में अमचूर की आवक शुरू हो गई है, लेकिन जिस तरह की गुणवत्ता की उम्मीद कारोबारी कर रहे थे, वैसा अब तक दिखा नहीं है।
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दंतेवाड़ा में होगा पहला जैविक सुपर मार्केट


जैविक खेती करने वाले किसानों के लिए राज्य का पहला ऑर्गेनिक सुपर मार्केट दंतेवाड़ा में बनाया जा रहा है। जिला प्रशासन की पहल पर दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय के सर्किट हाऊस के सामने इसका निर्माण शुरू हुआ है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक पूरे राज्य में अब तक किसी भी जिले में इतने बड़े किसान समूह वाले आर्गेनिक मार्केट की शुरूआत इससे पहले नहीं हुई थी। लिहाजा यह राज्य का पहला ऐसा मार्केट होगा। इसमें किसानों द्वारा जैविक विधि से उगाए गए धान के अलावा सब्जियों की बिक्री की सुविधा भी मिलेगी। 

सुपर मार्केट का संचालन दूध उत्पादन, प्रोसेसिंग और बिक्री के लिए जिले में संचालित क्षीरसागर को-आपरेटिव सोसाइटी की तर्ज पर स्थानीय किसानों की एग्रीकल्चर फार्मर्स को-आपरेटिव समिति करेगी। निर्माणाधीन सुपर मार्केट में किसानों की को-आपरेटिव समिति द्वारा जैविक उत्पादों की बिक्री के लिए स्थायी स्टॉल तो होंगे ही, ग्रामीण इलाकों से आने वाले किसानों के लिए सब्जियों की खुदरा बिक्री के लिए भी जगह का पर्याप्त इंतजाम रहेगा। समिति में जिले के जैविक कृषि समूहों के 500 से अधिक किसान जुड़ेंगे। समिति के पंजीयन की प्रक्रिया भी शुरू की जा चुकी है। 

दंतेवाड़ा को राज्य का पहला जैविक कृषि जिले के तौर पर विकसित करने का प्रयास पिछले 2 साल से जारी है। जिले में पहले ही रासायनिक खाद और कीटनाशकों के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसके लिए जीवामृत खाद बनाने और कीट नियंत्रित करने उपयोगी हांडी दवा बनाने की ट्रेनिंग जिले भर के किसान समूहों को दी जा रही है। रासायनिक खाद और कीटनाशकों के बेहिसाब उपयोग से अनाज और सब्जियों के स्वाद में बदलाव महसूस किया जाने लगा है। जैविक विधि से उगाई गई फसल को स्वास्थ्यवर्धक और निरापद माना जाता है, जिससे पिछले कुछ सालों से जैविक उत्पादों के इस्तेमाल के प्रति लोगों का झुकाव बढ़ा है। मार्केट में बनने वाले मिनी कोल्ड स्टोरेज में किसान सब्जियों को 2-3 दिन तक सुरक्षित रख पाएंगे। 

अधिक दिनों तक सुरक्षित रखने की जरूरत पडऩे पर वन विभाग के बड़े कोल्ड स्टोरेज का भी उपयोग किया जा सकेगा। यहां पंजीकृत किसान समूहों को ही प्राथमिकता मिलेगी। दंतेवाड़ा के जिलाधिकारी केसी देवसेनापति के मुताबिक जैविक विधि से उगाई जाने वाली फसल के लिए मार्केट दिलाने के प्रयास अरसे से किए जा रहे थे ताकि किसानों को प्रोत्साहित किया जा सके।
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